२८-२९ अक्टूबर 2009 की रात में अयोध्या में पञ्च-कोषीपरिक्रमा पुनः इस वर्ष किया, इसके पूर्व जब परिक्रमा की थी तो हम सरकारी अधिकारी थे,एकाध बार तो मेले में ही मजिस्ट्रेट के रूप में तैनात रहे,इस बार हम एक सामान्यआदमी की तरह परिक्रमा- पथ पर चलती हुई अपार भीड़ में बिल्कुल अकेले चल रहे थे,जब साथ कोई न हो,कुछ नहो तो असंग की स्थिति होती है, प्रातः चार बजे का समय था,परिक्रमा -पथ पर चलते समय रामराम कहने केअलावा इधर उधर देखते जा रहे थे,स्त्रीपुरुष ,बच्चे-बूढे,सभी अपनी धुन में सीताराम -सीताराम कहते चले जा रहेथे,निम्न एवं मध्यम बर्ग की कतिपय महिलाएं राम जन्म ,सीता-स्वयंबर,बन-गमन, लक्ष्मण -मूर्छा , आदि काकारुणिक बर्णन लोक-संगीत के माध्यम से कर रहीं थीं उच्च तथा मध्यमोच्च बर्ग के लोग मानों.इस बात काप्रदर्शन कर रहे थे कि इतने बड़े होते हुए भी वह परिक्रमा कर रहे हैं .सब के मन में कुछ न कुछ चाह थी,कामनाथी,याचना थी,तृष्णा थी,लोभ था,मोह था,राग था,द्वेष था.यह अपेक्षा उससे थी जो इससे मुक्त था।
परिक्रमा वस्तुतः एक ब्यावाहारिक.बैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक ब्यवस्था है.जो भुक्ति तथा मुक्ति दोनों को लक्ष्य कर के निर्धारित कीगयी है. कार्तिक माह में मौसम में बदलाव आता है. गर्मी के बाद जाडा आता है. इसलिए कार्तिक की नवमी,एकादशी तथा पूर्णिमा को क्रमशः चौदह कोशी ,पञ्च कोशी परिक्रमा तथा पूर्णिमा-स्नान का निर्धारण किया गया है. नवमी को चौदहकोष की परिक्रमा जो लगभग ४५ किलोमीटर में है, की जाती है. यह काफी श्रमसाध्य है जिसे करने के बाद थकावट आ जाती है, साथ ही नंगे पांव करने के कारण लोग थक कर चूर हो जाते हैं किंतु इसे करने के बाद तितीक्षा तथा सहनशीलता में काफी बृद्धि होती है .यहाँ यह विचारणीय है कि यदि इसी पर छोड़ दिया जाय तो पैरों की क्रियाशीलता दुष्प्रभावित हो जायगी ,अतः एकादशी को पंचकोशी [जो लगभग सोलह किलोमीटर है] परिक्रमा का निर्धारण किया गया है,इसे कर लेने के बाद थकावट एकदम दूर हो जाती है .एकादशी से पूर्णिमा तक अयोध्या मेंरह कर सत्संग,भजन-पूजन,इत्यादि करते हुए पूर्णमासी को सरयू-स्नान कर तथा पूर्णतया स्वस्थ होकर लोग घरजाते हैं।
इस लौकिकता के गर्भ में एक आध्यात्मिक रहस्य छिपा है.वास्तव में कोष का अर्थ यहाँखजाना,मंजूषा,गुहा से है .चौदह कोष का अभिप्राय पञ्च कर्मेन्द्रियाँ,पञ्च ज्ञानेन्द्रियाँ तथा चार अन्तः करणमन,बुद्धि,चित्त तथा अंहकार से है.इसकी परिक्रमा करके यानी इसपर नियंत्रण होने के बाद ब्यक्ति पञ्च कोष केक्षेत्र में प्रबेश करता है.यह पञ्च कोष क्रमशः अन्नमयकोश,प्राणमाय कोष ,मनोमय कोष,विज्ञानमय कोष ,तथाआनंदमय कोष.है जिसे ब्यक्ति क्रमशः पार करता है और तभी पूर्णिमा-स्नान का अधिकारी होता है.पूर्णिमा काअभिप्राय पूर्ण प्रकाश,पूर्ण सूख, पूर्ण आनंद है। यह परम स्थिति है.सुखी मीन जिमी नीर अगाधा,जिमी हरि शरणन एकहू बाधा . किंतु यह अयोध्या में रह कर,साधू-संन्यासी तथा सदगुरू के सानिध्य में रह कर,तथा अयोध्या केउत्तर में बहने वाली सरयू में स्नान करके ही किया जा सकता है. ।
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Monday, November 2, 2009
Monday, December 29, 2008
जय जय श्री राधे

आज राधा के उपासना की बाढ़ सी आयी हुई है। लोग प्राय:कहते हॆ किराधा-राधा श्याम मिला दे. किंतु लोग यह नही जानते कि राधा कौन हैऔर वह किस प्रकार श्याम से मिला सकती है!
इस तथ्य को समझने के लिए हमें भगवान कृष्ण के जीवन चरित्र कोजानना होगा। शास्त्रो मे ऐसा उल्लेख मिलता है कि भगवान कृष्ण केआठ पटरानियाँ थीं । रुक्मिणी , सत्यभामा आदि भगवान की पटरानियाँहैं। श्री राधाजी की गणना उनमे नही है। वस्तुतः वह भगवान कीपराशक्ति हैं अर्थात वह कृष्ण ही है।
गीता में भगवान अपने श्रीमुख से अपनी प्रकृति का वर्णन करते हुएकहते हैं ;
भूमिरापो नलो बायुः खं मनोबुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरश्ट्धा।
बस्तुतः यही आठ प्रकृति - भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि, और अहंकार ही आठ पटरानियां हैं जोभगवान् कृष्ण की अपरा प्रकृति है तथा जड़ है . आगे वह कहते हैं-
अपरेयं इतस्त्वन्यां प्रकृतिम बिद्धि मे परां।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत।
यह जीवभूता ही भगवान की परा प्रकृति है, यही राधा है. यहाँ एक बात और समझने की है. प्रवाह को धारा कहते हैं. धारा हमेशा ऊपर से नीचे को जाती हैं.यानी जीव का इन्द्रियों और इन्द्रियों का बिषयों की ओर होने वाला प्रबाह धाराहै और जीव का ब्रह्म की ओर प्रबाह ’राधा’ है. राधा परमात्मा की चित शक्ति हैं वह परमात्मा ही हैं. गोस्वामीतुलसीदास कहते हैं-
गिरा अर्थ जल बीचि सम कहि अस भिन्न न भिन्न।
इस प्रकार दोनो एक ही हैं,अभिन्न हैं.
जय जय श्री राधे
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